उच्च नैतिक मूल्यों तथा आदर्शों से परिपूर्ण मापदंड रही हैं कुलपति की परंपरा, छात्रहीत तथा संवाद अहम कड़ी।

“अतीत में तब कैसे हुये थे कुलपति? योगदान एंव जीवन वृतांत “
भारत देश ज्ञान एंव त्याग की भूमि रही है, जिसमें तपे- तपाये ऋषि- मुनियों ने अपने तपोबल से योग एंव ज्ञान परंपरा के उच्च मापदंडों की नीवं रखी थी। पुरातन भारत में ज्ञान तथा जागृति के मुख्य केंद्र गुरुकुल होते थे,जहां पर शिष्य ब्रह्मचारी जीवन जीते हुए योग विद्या, अध्यात्मविद्या, संस्कृत भाषा, का ज्ञानार्जन करते थे। इसी लिए गुरुकुल आश्रमों के प्रधान ऋषि – मुनि कुलपति कहलाते थे। कालिदास जी ने ऋषि वशिष्ठ तथा कण्व ऋषि को कुलपति की संज्ञा दी है। विश्व के लिए शिक्षा की सबसे महत्वपूर्ण तथा गौरवशाली परंपरा का पर्याय रहे नालंदा, विक्रमशिला, तक्षशिला विश्वविद्यालय के कुलपतियों, शिक्षाविदों का विवरण चीनी यात्री हेनसांग अपनी यात्रा वृतांत में लिखते है। भारत देश के आचार्यों तथा कुलपतियों के इतिहास का अवलोकन किया जाता है तब यह ज्ञात होता कि भले ही आजादी के बाद भारत में अनपढ़ लोगों की तादाद बहुत ज्यादा थी। भुखमरी चरम सीमा पर थी। देश अत्यंत गरीबी की हालत से जूझ रहा था। तब कैसे कुलपति हुए ? यह एक विचारणीय तथा ऐतिहासिक तथ्य है। जिसकी जानकारी आज की युवा पीढ़ी के लिए अत्यन्य ही प्रेरणादायी होगा। क्योंकि देश सहित दुनिया के अन्य देशों में भी शिक्षाविदों, आचार्यो तथा कुलपतियों के चयन मापदंड, उनके पद का राजनीतिकरण, प्रदत्त शक्तियों का नियुक्तियों में अनियमित तरीके से प्रयोग की खबरें आजकल आम -तौर पर विभिन्न शिक्षण संस्थानों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहा है। परंतु कुछ अपवाद भी जरूर हैं? देश में कुलपतियों के श्रृखंला को दृष्टिगत किया जाये तो सर आशुतोष मुखर्जी, सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन, सीआर रेड्डी, डॉ. गंगानाथ झा, डॉ. अमरनाथ झा, लक्ष्मणस्वामी मुदालियार, आचार्य नरेंद्रदेव जी, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, डॉ. हरिसिंह गौर, सर सुंदरलाल, महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जैसे उच्च सामाजिक, शैक्षणिक तथा राजनैतिक गुणों से परिपूर्ण व्यक्ति ही कुलपति होते थे जिनके लिए उच्च शिक्षा, शैक्षणिक अनुसंधान तथा संस्थान की गुणवत्तापूर्ण संचालन तथा छात्रों से संवाद एंव उनके हितों का त्वरित निस्तारण ही एकमात्र उद्देश्य था।
डॉ. हरि सिंह गौर जी के विषय में एक अत्यंत गौरवपूर्ण उल्लेख मिलता है कि उन्होंने अपने खुद के पैसें से सागर विश्वविद्यालय की स्थापना किया था। संस्थापक कुलपति भी रहे। एक बार अंतर- विश्वविद्यालय हाँकी प्रतियोगिता में सागर विश्वविद्यालय ने ।लिए नही है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक पंडित मदन मोहन मालवीय जी के है उनके घर में दो किचन थे। एक जिसमें उनका खाना बनता था। दूसरे में घर के अन्य लोगों का। एक दिन घर के किचन में नाश्ता तैयार नही था। मालवीय जी के पोते को परीक्षा देने जाना था। महाराज पूछने आया, आपके किचन में नाश्ता तैयार है, बच्चे को करा दू? मालवीय जी दोपहर तक भूखे रहे। पोता परीक्षा देकर लौटा, साथ खाने बैठे। अलग- अलग किचन से दोनों लोगों का खाना आया। पोते ने कहा- आप क्यों भूखे रहे? सुबह दोनों आपके किचन से नाश्ता कर सकते थे। मालवीय जी का जवाब था मेरी किचन में दान की चीजें आती है। मैं थोड़ा- बहुत देश सेवा भी करता हूँ। तुम लोग नही। इसलिए समाज सें दान में मिला अन्न, खानें का अधिकारी मैं हूं। तुम परिवार के सदस्य नही। इस तरीके की ईमानदारी, वफादारी, तथा संघर्षपूर्ण जीवनी से उन्होंने ज्ञान की तपशिला की नीवं डाली। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी सन् 1939-1948 तक कुलपति के कार्यभार को सफलतापूर्वक संपन्न किये। उनके विषय में एक तथ्य यह आता है कि सन् 1945 मे पी. रामालिंगम कैंपस खुलने के तीन दिन पहले ही विश्वविद्यालय पहुँच गये थे सभी छात्रावास पूर्ण तरीके से बंद पड़े थे। एक व्यक्ति की मदद से वह कुलपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी से मिले। उन्होंने तुरंत छात्रावास अधीक्षक को बुलाकर बंद पड़े छात्रावास को खोलने एंव सभी व्यवस्था करने की सुनिश्चितता का आदेश दिया। देश में समाजवादी संत,आचार्य नरेंद्रदेव जी कहते थे कि विश्वविद्यालय का कार्य केवल परंपरागत तथा तर्कसंगत ज्ञान का विधार्थियो के अंदर संचार करना ही नही है। अपितु उनके अंदर अंतर्निहित ऊर्जा को जगाना और राष्ट्रहीत में उनका उपयोग करना भी है। आचार्य जी पेशे से वकील थे, तथा मूलरूप से फैजाबाद जिले से संबंध रखते थे। सामाजिक आंदोलन की मुख्य धारा से होते हुए, सामाजिक, शैक्षणिक तथा राजनैतिक गतिविधियों की अनोखी परख आचार्य जी के पास थी। आचार्य जी सन् 1939 में राष्ट्रीय आंदोलन का बड़ा केंद्र बिंदु काशी विद्यापीठ वाराणसी के अध्यक्ष और बाद में कुलपति भी बने। आचार्य जी आगे चलकर सन् 1952 मे लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति नियुक्त हुए। जिस समय आचार्य जी ने लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति का कार्यभार ग्रहण किया था। उस समय उसकी हालत अत्यंत गंभीर थी। आचार्य जी की संवाद शैली, छात्रों से उनकी घनिष्ठ संबंध तथा छात्रो के लिए अपना सब कुछ समर्पित करने वाले नरेंद्रदेव जी के विषय में एक अद्भुत प्रसंग आता है। एक बार लखनऊ विश्वविद्यालय में छात्रवास में रहने की विकट समस्या उत्पन्न हो गयी। आचार्य जी अविलंब किये बगैर अपने कुलपति आवास को खाली करके उसे छात्रों को रहने के लिए देकर स्वंय किराये के मकान में रहने लगे। नरेंद्रदेव जी अपने नैतिक मूल्यों तथा मापदंडों के प्रति इतने सजग प्रहरी की भाँति जीवनयापन करते थे कि वह केवल 150 रुपये प्रतिमाह वेतन लेते थे।आचार्य जी बौद्ध दर्शन, सहित विज्ञान के विषयों को छोड़कर बाकी सभी विषयों पर अपनी गहरी पकड़ रखते थे। अपने कुलपति काल में जब कभी भी उन्हें खाली क्लास दिखता था, तुरंत क्लास मे जाकर पढ़ाने लगते थे। अभी उनका कार्यकाल पूरा नही हुआ था कि उन्हें काशी हिंदू विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त कर दिया गया। आचार्य जी जब लखनऊ विश्वविद्यालय से विदा हो रहे थे तब सैकड़ो- हजारों छात्र उनके गाड़ी के नीचे लेट गये थे। बहुत छात्र उनके गाड़ी के पीछे- पीछे भागते हुये वाराणसी तक आये। वाराणसी पहुँचने पर काशी हिंदू विश्वविद्यालय के छात्रों ने भव्य स्वागत किया और विश्वविद्यालय में दीपोत्सव मनाया। इस से यह प्रामणिक तथा स्पष्ट परिलक्षित हो रहा है कि पुरातन काल खंड के कुलपति तथा आचार्य छात्रों से संवाद तथा छात्र हितों के प्रति कितने गंभीर थे।। परंतु वर्तमान समय में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में छात्रों तथा विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच झड़प की घटनायें उजागर हो रही है। अगर वर्तमान घटनाओं का यहाँ पर जिक्र किया जाये तो गोरखपुर विश्वविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय, केंद्रीय विश्वविद्यालय प्रयागराज, काशी हिंदू विश्वविद्यालय सहित देश के सभी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय प्रमुख रहे है। जिसमें प्रमुख रूप से छात्रों तथा विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच संवादहीनता तथा छात्रहीत की अवहेलना प्रमुख रूप से नजर आती है। छात्रों के समस्याओं, फीस वृद्धि, हास्टल की समस्या, भोजन की गुणवत्तापूर्ण आपूर्ति, सहित सांस्कृतिक जागरण हेतु विभिन्न तरीके के अभियान से उनके नेतृत्व के गुण को विकसित करने के लिए आवश्यक प्रयासों की अनदेखी तथा उसके क्रियान्वयन मे सुस्ती प्रमुख कारण है। किसी भी समाज तथा राष्ट्र के मूल धुरी में युवा केंद्रित होना चाहिए, तभी जाकर हम उसकी ऊर्जा का समाज को बेहतर बनाने में पूर्ण रूप से उपयोग कर सकते हैं।।
लेखक:- कल्याण सिंह।
शोध छात्र,
अध्यक्ष छात्र परिषद, बांदा कृषि एंव प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, बांदा।।
