ददरी मेला का गौरव घटता देखना पीड़ादायक: आद्याशंकर यादव बोले – आस्था और संस्कृति का प्रतीक अब बनता जा रहा है व्यवसाय का केंद्र

बलिया। बागी बलिया की पहचान, आस्था और परंपरा का प्रतीक ऐतिहासिक ददरी मेला आज अपने मूल स्वरूप से भटकता जा रहा है। इस पर गहरी चिंता जताते हुए समाजवादी पार्टी के प्रदेश सचिव एवं पूर्व जिला अध्यक्ष आद्याशंकर यादव ने कहा कि ददरी मेला जो कभी आस्था, विश्वास और गौरव का प्रतीक था, आज केवल पैसों के इर्द-गिर्द सिमटता जा रहा है।

आद्याशंकर यादव ने कहा कि ददरी मेला का इतिहास लगभग सात हजार वर्ष पुराना है। यह मेला महर्षि भृगु और दर्दर मुनि से जुड़ा हुआ है तथा यह बागी बलिया की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक रहा है। उन्होंने बताया कि एक समय यह मेला ढाका से मलमल, ईरान से घोड़े और देश के कोने-कोने से आने वाले व्यापारियों के लिए एक विशाल व्यापारिक और सांस्कृतिक केंद्र हुआ करता था।

उन्होंने कहा कि कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर गंगा–सरयू संगम में स्नान और महर्षि भृगु के आश्रम से जुड़ाव के कारण इस मेले का गहरा धार्मिक महत्व है। मगर आज यह मेला अपने धार्मिक और सांस्कृतिक स्वरूप से दूर होता जा रहा है।

आद्याशंकर यादव ने कहा कि समय के साथ कई पुराने मेले व्यावसायिकता की भेंट चढ़ गए हैं और ददरी मेला भी उसी दिशा में जा रहा है, जो चिंता का विषय है।

> “ददरी मेला केवल व्यापार नहीं, बलिया की आत्मा है। इसकी परंपरा और गौरव को बचाने की दिशा में प्रशासन और समाज को मिलकर ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।” – आद्याशंकर यादव

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