डम्बर बाबा की खाली परती को जो भी कब्जा करना चाहा उसे दुखो का सामना करना पड़ा।

बिल्थरारोड। स्थानीय नगर के दक्षिण दिशा में पशुहारी मार्ग पर एक किलोमीटर दूरी पर बाबा दिगम्बर नाथ की लगभग सौ एकड़ जमीन है। बाबा दिगम्बर नाथ की महिमा पुर्वान्चल के ख्याति प्राप्त शक्ति पीठो मे से एक है। आज कालान्तर मे दिगम्बर बाबा के स्थान को डम्बर बाबा के परती के नाम से जाना जाता है। जहॉ पर हर वर्ष सावन के चौथे बृहस्पतिवार को बाबा की परती मे मेला लगता है। जहां पर लोग कभी झूठी कसम नही खाते है बाबा की परती पर लोग मन्नत पूरी होने पर बाबा की परती मे भूसा व प्रसाद चढाते है। तथा अखण्ड हरिकीर्तन कराते है। बाबा दिगम्बर नाथ ने गाय का वध करने से बचाने मे अपने प्राणो की आहूति दे दी। बाबा की परती को कोई न तो निर्माण कार्य करता है। और न ही जोतता है। जनश्रुति के अनुसार बताया जाता है कि क्षेत्र के मिश्रौली गॉव निवासी बाबा दिगम्बर नाथ का जन्म एक ब्राहम्ण परिवार मे हुआ था। उस समय पूरे देश पर मुगल साम्राज्य स्थापित था। और क्षेत्र एक गॉव एक रियासत थी जहॉ पर एक मुस्लिम शासक था। शासक के यहां बाबा दिगम्बर नाथ नौकरी करते थे। उस समय शासक के लड़के की बारात आजमगढ़ जिले मे गयी हुई थी। बाबा दिगम्बर भी उस बारात मे गये हुए थे। शासक बाबा दिगम्बर से कहा कि दिगम्बर जाओ घोड़े को खिला दो और उनके पैरो की मालिस कर दो। शासक की बात सुनकर बाबा दिगम्बर ने कहा कि यह हमारा काम नही है ंहमारा काम दूसरा है। बाबा दिगम्बर की बात शासक को नागवार लगी और कहा कि मैं तुझें बताऊगा। सुबह होने पर मुस्लिम शासक ने एक गाय को मगवाया और एक अहाते मे बाधवा दिया और बाबा दिगम्बर को बुलाकर कहा कि ये तलवार लो और गाय का वध कर दो। बाबा दिगम्बर मारने के भय से हाथ मे तलवार लेकर गाय का वध करने के लिए चले गये। शासक ने बाबा दिगम्बर की पहरेदारी मे दो लोगो को लगा दिया। बाबा दिगम्बर ने पहरेदारी मे लगे दोनो को तलवार से काट दिया और गाय की रस्सी भी काट दी जिससे गाय वहॉ से भाग निकली और स्वयं भी वहां से भाग निकले। जब यह बात मुस्लिम शासक को पता चली तो बाबा दिगम्बर को मारने के लिए अपने लोगो को दौड़ा दियां। बाबा दिगम्बर भागते भागते टौंस नदी को पार कर रहे थे कि शासक के लोगो ने भाला चला दिया। भाला लगने के बाद भी बाबा दिगम्बर लड़खड़ाते हुए कुछ दूर भागने के बाद गिर पड़े। वहां पर यादव जाति के चरवाहे गाय चरा रहे थे। बाबा को गिरा देख दौड़ पडे़। बाबा दिगम्बर ने पूरे बृतान्त को बताया। चरवाहो ने चारपाई मगांकर बाबा को लादकर उनके गॉव की ओर चल दिये। बाबा को बीच रास्ते मे जहां जहां रखा वहां आज भी परती है। मऊ जिले के इन्दारा के पास भी बाबा की परती है। तथा बलिया जिले के चरौवां गॉव के पास लगभग 50 बीघा जमीन है। अन्त मे मिश्रौली गॉव के पास लाये ओर बाबा के परिवार के लोग भी वहां आ गये। बाबा दिगम्बर ने परिजनो समेत अन्य लोगो से कहा कि ये सारी जमीन पशुओ के चरने के लिए छोड़ दो। इतना कहते ही बाबा दिगम्बर के प्राण पखेरु उड़ गये। आज कालान्तर मे बाबा दिगम्बर की परती को डम्बर बाबा की परती के नाम से जाना जाता है। बाबा की परती मे आकर जो लोग मन्नत मॉगते है बाबा उनकी मुरादे अवष्य पुरी करते है। हर वर्ष सावन के शुक्ल पक्ष के पहले बृहस्पतिवार को डम्बर बाबा की परती मे मेला लगता है। जहॉ लोग मन्नत पुरी होने के बाद पशुओ को भूसा खिलाते है और पूजन करते है। बाबा का कोई मन्दिर नही है सैकड़ो एकड़ खाली परती पर ही पूजा होती है। बाबा की खाली परती को जो भी कब्जा करना चाहा उसे दुखो का सामना करना पड़ा। सरकार का भी बाबा की परती पर निर्माण कार्य कराने के नाम पर रुह कॉप जाता है।

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