पुत्र के दीर्घायु, स्वस्थ एवं आरोग्य जीवन प्राप्ति के लिए जीवित्पुत्रिका व्रत करती है महिलाएं- पण्डित आशीष मिश्र

जीवित्पुत्रिका व्रत से पहले खरीदारी करते लोग

बिल्थरारोड। सनातन धर्म के प्रमुख तीज त्योहारों में जीवित्पुत्रिका व्रत को एक अलग स्थान प्राप्त है। यह व्रत माताएं अपने पुत्र के दीर्घायु, स्वस्थ एवं आरोग्य जीवन की प्राप्ति के लिए करती है।इस वर्ष 18 सितम्बर दिन रविवार को माताएं जीवित्पुत्रिका व्रत रखेंगी।छठ पर्व की तरह ही इस व्रत में भी नहाय-खाय की परंपरा होती है।नवमी तिथि में इस व्रत का पारण किया जाता है। विद्वानों के अनुसार अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जीवित्पुत्रिका मनाया जाता है।इसे जिउतिया या जितिया व्रत भी कहा जाता है। पुत्र की दीर्घ आयु, आरोग्य और सुखमयी जीवन के लिए इस दिन माताएं व्रत रखती हैं।तीज की तरह यह व्रत भी बिना आहार और निर्जला रखना पड़ता है। पं. आशीष मिश्र के अनुसार जीवित्पुत्रिका व्रत में भी छठ पर्व की तरह नहाय-खाय की परंपरा होती है।यह पर्व तीन दिन तक मनाया जाता है।सप्तमी तिथि को नहाय-खाय के बाद अष्टमी तिथि को महिलाएं बच्चों की समृद्धि और उन्नति के लिए निर्जला व्रत रखती हैं।इसके बाद नवमी तिथि यानी अगले दिन व्रत का पारण किया जाता है यानी व्रत खोला जाता है। किवंदतियो के अनुसार महाभारत के युद्ध में पिता की मौत के बाद अश्वत्थामा बहुत नाराज था।सीने में बदले की भावना लिए वह पांडवों के शिविर में घुस गया।शिविर के अंदर पांच लोग सो रहे थे।अश्वत्थामा ने उन्हें पांडव समझकर मार डाला। कहा जाता है कि सभी द्रौपदी की पांच संतानें थीं। अर्जुन ने अश्वत्थामा को बंदी बनाकर उसकी दिव्य मणि छीन ली। क्रोध में आकर अश्वत्थामा ने अभिमन्यु की पत्नी के गर्भ में पल रहे बच्चे को मार डाला।ऐसे में भगवान कृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल उत्तरा की अजन्मी संतान को देकर उसके गर्भ में पल रहे बच्चे को पुन: जीवित कर दिया। भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से जीवित होने वाले इस बच्चे को जीवित्पुत्रिका नाम दिया गया। तभी से संतान की लंबी उम्र और मंगल कामना के लिए हर साल माताएं जीवित्पुत्रिका व्रत रखने की परंपरा को निभाती है।यह व्रत मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के अलावा कई प्रांतों में किया जाता है। उत्तर पूर्वी राज्यों में जीवित्पुत्रिका व्रत बहुत लोकप्रिय है। माना जाता है कि माताएं संतान की संख्या के अनुसार सोने या चांदी की जिउतिया बनवाकर कलावा में गूंथ कर व्रत के दिन सायंकाल पूजा करती है,उसके बाद उसे धारण करती है।

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