मुद्दों पर आधारित राजनीति करने को विवश करती “आप “

लेखक अमन बरनवाल

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात से ही देश की एक बड़ी आबादी के समक्ष अपनी मूलभूत आवश्यकताओ ( रोटी , कपड़ा , मकान शिक्षा , स्वास्थ्य , बिजली , सड़क ) को पूर्ण करने की चुनौती रही हैं. एक तरफ़ जहाँ स्वतंत्रता प्राप्ति के 75 वर्षों के पश्चात देश में विकास के उच्च आयाम स्थापित किए गए हैं , वहीं दूसरी तरफ़ आज भी एक बड़ी आबादी ग़रीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने पर विवश है . सामन्य से भी नीचे जीवन यापन करने वाले एक बड़े तबके के संदर्भ में सरकारी तथा प्रशासनिक उदासीनता भी एक प्रमुख कारण है .
विश्व का सबसे वृहद लोकतंत्र होने के नाते भारत में निर्वाचन व्यवस्था के भी कई चरण हैं . यूँ तो हर पाँच वर्ष पर देश में लोकसभा तथा राज्यों में विधानसभा के चुनाव होते हैं किंतु यक्ष प्रश्न ये है कि आम जनता की स्थिति कितनी परिवर्तित होती है ? यदि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात से भारतीय राजनीतिक परिदृश्य का मूल्याँकन किया जाए तो चुनावों में राजनीतिक दलों ने मूलभूत मुद्दों के अलावा अन्य मुद्दों को ज़्यादा वरीयता दी है . किंतु अभी हाल ही के कुछ वर्षों में सिर्फ़ दिल्ली ही नही बल्कि देश के कई राज्यों में राजनीतिक रूप से अतिसक्रिय हुई आम आदमी पार्टी ने परम्परागत राजनीति से इतर एक नई मूलभूत मुद्दों पर आधारित “राजनीति” को प्रस्तुत किया है . 2013 में पहली बार दिल्ली में सत्ता में आई आम आदमी पार्टी की सरकार ने , न सिर्फ़ मूलभूत मुद्दों को वरीयता दिया बल्कि दिल्ली की एक बहुत बड़ी निम्न तथा मध्यम वर्गीय आबादी को बड़े स्तर पर लाभान्वित भी किया . मानक सरकारी विद्यालय , मुफ़्त चिकित्सकीय सुविधा , 200unit तक फ़्री बिजली , तीर्थ यात्रा योजना , फ़रिश्ते योजना इत्यादि जनकल्याणकारी योजनाओं का नतीजा ये रहा कि लगातार तीन बार दिल्ली की जनता ने “ आप “ को प्रचंड जनादेश दिया . दिल्ली की “ आप “ सरकार के शिक्षा माडल ने देश के अन्य राज्यों के समक्ष एक मानक स्थापित किया .
अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश समेत देश के पाँच राज्यों में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनावों में राजनीतिक दलों ने अपने घोषणा पत्र में जब बिजली मुफ़्त देने के वायदे को सम्मिलित किया तब यह प्रश्न उठना लाज़मी था कि मूलभूत मुद्दों की राजनीति करने वाली आम आदमी पार्टी ने क्या ये स्थिति राजनीतिक दलों के समक्ष उत्पन्न की है ? पंजाब में आम आदमी पार्टी को प्राप्त प्रचंड जनादेश इस बात की तरफ़ इशारा कर रहा है कि जातिगत और धर्मगत राजनीति के अलावा मूलभूत मुद्दों को भी आम जन के द्वारा व्यापक तरजीह दी जा रही है और दिल्ली तथा पंजाब सरीखे राज्य इसके उदाहरण हैं .
कुल मिलाकर वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में राजनीति का स्वरूप जनकल्याणकारी होना नितांत आवश्यक है और आम आदमी पार्टी जैसे राजनीतिक दल बख़ूबी इस पर खरा उतरने के लिए प्रयासरत हैं .

अमन बरनवाल

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