शिक्षा संस्कार एक मात्र भारत का सनातन धर्म देता है- जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानन्द सरस्वती



बिल्थरारोड।नगर के चौकियामोड़ स्थित सर्वेश्वर मानस मंदिर के तत्वावधान में चल रहे पंचकुंडीय महायज्ञ व कथा के चौथे दिन शुक्रवार शाम को जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नरेन्द्रानन्द सरस्वती जी महराज ने कहा कि 192 देशों में कोई ऐसा ब्यक्ति ऐसा नही है जो अपनी आत्मा पर कन्ट्रोल किया हो। या कन्ट्रोल करने की शिक्षा देता है। इस लिए एक मात्र शिक्षा संस्कार भारत का सनातन धर्म देता है जिसका न कोई आदि है और न अंत है। जबसे सृष्टि है। सनातन पहले न मिटा और न मिटने वाला है।यज्ञ विखण्डित, विभाजित व असंगठित समाज को जोड़ने का सशक्त माध्यम था। आज है और सुष्टि प्यन्त रहेगा। यज्ञ ही शिव है, शक्ति है, स्मिता है। यज्ञ आस्था है यज्ञ से जो भी चाहों प्राप्त कर सकते हो। कल्प वृक्ष है संतान, धन, सुख सब कुछ प्राप्त करों।सनातन जब प्रहार होता है तो कभी राम के रुप में तो कभी कृष्ण, जगत जननी दुर्गा कहीं काली के रुप में परमशक्ति अवतार लेती है।गंगा का जल ऐसा जल है जिसमें वैक्टिरिया के जिवांश 48 घंटे में स्वतः नष्ट हो जाते है। भागीरथ ने उपासना किया तो भगवान अपनी जटाओ में गंगा को उलझा देते है। मकर संक्रांति के पर्व पर स्नान करते है तो पित्रों तर्पण करने पर पितरों की शरीर की नकारात्मक शक्ति उर्जा शक्ति नष्ट होकर सकारात्मक उर्जा पितरों को प्राप्त होता है। अपनी कटुता का परित्याग कर एक साथ बैठते हैं, विरोधियों की कटुता मिट जाय, तो यही राम राज्य है।विश्व में अशांति का पर्याय रावण की संस्कृति थी किन्ुत भगवान राम ने निषाद को गले लगाया। विश्व ब्यापी एक शक्ति का निर्माण किया था।विश्व में शांति हो सद्भाव हो, एकता का वातावरण निर्मित हो। और तुलसी के शब्दों में जीव मात्र में मनुष्य मात्र में दानबीर प्रबृतियों इनका अंत होकर सभी में देवत्व का दर्शन करें। तुलसी के शब्दों में सियाराम मय सब जग जानी। मनुष्य के अन्दर हम परम सत्ता ईश्वरी सत्ता और उसके अन्दर रहने वाली चिन्मयी अद्वैत विलक्षण उस आत्मा को जब देखते है। आत्मा को अग्नि कभी नष्ट नही कर सकती। अद्वैत विश्व का एक मात्र दर्शन है वह जीवन पद्धति है, जो सर्व श्रेष्ठ है। वेद सनातन का आधार बैदिक संस्कृति है। वेद है और बेद भगवान का भगवान का विश्वास रुप है। अमेरिका, रुस व चाइना की विस्तारवादी नीति विश्व में अशांति का सृजन कर रही है। बेगुनाह, बेकसूरों का रक्तपात ये बेधर्मी संस्कृति के लोग करते हैं तो विश्व में अशांति का वातावरण निर्मित होता है। लेकिन भारत के संतो का जो चिन्तन था जिस मंथन के द्वारा अद्वैत परमसत्ता का 2532 वर्ष पूर्व आचार्य शंकर के रक्त के कालातिर में जहां 7 वर्ष की उम्र में उन्होने पद यात्रा करते हुए ओम कालेश्वर में ममलेश्वर का साक्षात्कार करते हुए और भारत को एकसूत्र में जोड़ने के लिए अद्वैत दर्शन का आधार लेकर बसुधैव संस्कृति का बोध कराया था। यही इस यज्ञ का मूल मंत्र है। सरयू का जो प्रवाह है, अगर उसमें आप डुबकी लगाते हैं तो भाषा, प्रान्त या जाति का कोई आधार नही है।वृन्दाबन से पधारे प्रवीण कृष्ण जी महराज ने नारद जी को एक बार काम पर विजय पा लिया। उसे भगवान शिव के पास गये और काम पर विजय पाने की बात बताई। लेकिन भगवान शिव ने सुनकर कहीं अन्यत्र बताने से मना किया था। फिर क्या था उनका मोह अंत में भंग हुआ। कहा कि जीवन में यदि कोई सफलता मिले तो उसे चर्चा नही करनी चाहिए। महराज ने भक्ति गीतों से सभी भक्तजनों को मंत्रमुग्ध कर दिया।इस मौके पर कृत्रिम गंगा नदी कायम कर गंगा माता की मुर्ति के समक्ष वाराणसी से आये विद्वानों द्वारा भब्य आरती किया गया। इस अवसर पर भारी संख्या में श्रद्धालु गण उपस्थित रहे।
