विश्व गौरैया दिवस : आओ सुने चहचहाहट, घर-आंगन में फिर नन्ही चिड़िया की फुर-फुर उड़ान लौटाएं
बिन्नू वर्मा
बलिया। सूने घरौंदे करें पुकार, गौरैया आओ यहां ठिकाना बनाओ। आंगन में फुदकने वाली गौरैया से फ्लैट की संस्कृति ने आंगन छीन लिया है। शहर में बड़े बड़े मकान बन गए। कंक्रीट के जंगल की वजह से पेड़ पौधे अब ना के बराबर हैं। विकास की आंधी में पेड़ों की टहनियां टूटती गईं। उदास, निराश गौरैया जाए तो कहां।
आशियाने को तरसतीं गौरैया धीरे-धीरे इंसानी आंखों से ओझल होती गई, लेकिन वाराणसी शहर में कुछ ऐसे लोग भी हैं, जिन्होंने गौरैया को बचाने के लिए करोड़ों की कोठियों की शोभा को ताक पर रख दिया। संरक्षण मांगती गौरैया की करुण पुकार इन लोगों को भावुक कर गई। इन्होंने गौरैया को अपने घर में बसाया, सुंदर आशियाना बनवाया।
विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत 2010 में हुई थी। कई देशों में इसे अलग-अलग गतिविधियों एवं जागरूकता आयोजनों के साथ मनाया जाता है। इस दिन लोग संरक्षण व विलुप्त होती गौरैया को बचाने के लिए कदम उठाते हैं। नेचर फॉरेवर सोसाइटी इंडिया एवं इको सिस एक्शन फाउंडेशन फ्रांस ने मिलकर इस दिन को शुरू किया है।
काशी के गोपाल द्वारा गौरैया संरक्षण के लिए तीन साल पहले शुरू की गई पहल अब रंग लाने लगी है। वाराणसी सहित पांच जिलों में गोपाल व उनकी 200 वालंटियर की टोली ने 74 हजार घोंसले लगाए हैं। यहां गौरैया व उनके बच्चों को शरण मिल रही है। इससे लुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी इस प्रजाति का कुनबा बढ़ने लगा है।
लॉकडाउन में भी गोपाल ने सोशल मीडिया के जरिए बच्चों, युवाओं और महिलाओं को जागरूक किया। गोपाल बताते हैं कि सोशल मीडिया पर अभियान शुरू कर लोगों से घोंसला तैयार कर अपने घर पर रखवाया था, वहां अब गौरैयों का आना शुरू हो चुका है। गोपाल व उनकी टीम ने अब तक 60 बच्चों को घोंसला बनाने का प्रशिक्षण दिया है।
ऐसे बढ़ेगा गौरैया का कुनबा:–
छत, पार्क व बालकनी में बर्तन में दाना पानी भरकर रखें।
प्रजनन के समय उनके अंडों की सुरक्षा करें।
घर के बाहर ऊंचाई व सुरक्षित जगह लकड़ी के घोंसले लटका सकते हैं।
आंगन व पार्कों में कनेर, नींबू, अमरूद, अनार, मेहंदी, बांस, चांदनी के पौधे लगाएं।

