“उम्मीद “ इस एक शब्द के निहितार्थ इतने तरीक़ों से निकाले जा सकते हैं कि हर एक व्यक्ति अपने नज़रिए से इसे परिभाषित कर सकता है . कहते हैं कि उम्मीद पर दुनिया टिकी है लेकिन जब यही उम्मीद टूटती है तब क्या होता है ?
इसी उम्मीद के कई पहलुओं को ध्यान मे रखकर नगर के युवा अमन बरनवाल ने लिखी है एक कविता “ उम्मीद “

उम्मीद


अक्सर हम बंधे होते हैं आशा की एक डोर से
जो हमें जीवन जीने की वजह देती है
इक उम्मीद के सहारे काटी जाती है ज़िंदगी
जीने के लिए उम्मीद उतनी ही ज़रूरी है जितना कि आक्सीजन
पर जब किसी से की गई उम्मीद की डोर टूटती है
तो सिर्फ़ उम्मीद ही नही इंसान भी टूट जाता है
बिखर जाता है , निर्जीव सा हो जाता है
धीरे धीरे आँखे भी बंजर रेगिस्तान सी हो जाती है
आँसू सारे बहते बहते ख़त्म हो जाते हैं
जीवन अंधकारमय सा प्रतीत होने लगता है
पर यहीं से शुरू होती है , पुरुष से महापुरुष बनने की यात्रा
तमाम संकटों , बाधाओं , विपत्तियों से जूझकर
प्रेरणादायक अनुभवों के सागर में गोते लगाकर
संघर्ष की कोख से जन्म होता है एक असाधारण इंसान का

जी हाँ , असाधारण
जो बिल्कुल पिछले वाले से होता है अलग
उम्मीद से मुक्त और संघर्ष से तक़दीर बदलने

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