नई पीढ़ी के लिए डोली में बैठकर विदाई होना अतीत की बात बन गयी है।

बिल्थरारोड : शादी विवाहों में दुल्हन और दूल्हे को ले जाने व् अमीरी तथा गरीबी की समानता का प्रतिक ” डोली “में बैठाकर विदाई होना अतीत की बात बन गयी है। डोली – कहार का स्थान अब लक्जरी गाड़िया ले चुकी है।
नयी पीढ़ी के लिए डोली – कहार की बात शादी के कार्डो और लोक गीतों तथा फ़िल्मी गीतों तक ही सिमित है। केवल सुनने को ही मिल रही है। प्राचीन काल लेकर एक दशक पूर्व तक दुल्हन की विदाई में डोली का ही प्रयोग होता रहा है। किन्तु अब यह कही देखने को नही मिल रहा है। शादी के समय औरते दुल्हन की विदाई के समय मांगलिक गीत गाती है । फिल्मो में डोली कहार से सम्बंधित कुछ गीते जैसे उठाओ रे डोली ले चलो कहार पिया मिलन की ऋतु आयी। इसके अलावे विवाह के समय दुल्हन की सखियां गीत गाती है कि डोली सजाके रखना ,मेंहदी लगा के रखना लेने तुझे ओ गोरी आयेगे तेरे सजना। इन विदाई गीतों से यह समझा जाय की दुल्हन और डोली का सम्बन्ध सदियों पुराना है। एक दशक पहले देखा जाय तो डोली कहार का प्रचलन बड़े पैमाने पर होता रहा है। डोली में बैठकर जब दुल्हन की विदाई होती थी तो बीच रास्ते में कहार रुक कर थोड़े देर आराम करते थे। दुल्हन के साथ डोली संग दुल्हन को रास्ते में पानी पिलाने के लिए एक महिला जाती थी। कहार भी रास्ते में पानी पीने व् आराम करने के बाद चल देते थे। ससुराल के लोग दुल्हन के आने का इंतजार करते थे। डोली के पहुँचते ही महिलाएं दुल्हन को डोली उतारने के लिए आती थी। जिस पर कहार मुँह मांगे नेग मानते थे नेग मिलने के बाद ही दुल्हन को डोली से उतारने देते थे। जिसमें कहारों की भी कमाई होती थी। किन्तु अब दुल्हन की विदाई डोली में होने के बजाय लक्जरी गाड़ियों में होने लगी है। डोली में दुल्हन की विदाई की प्रथा अब समाप्त हो चुकी है। सिर्फ वैवाहिक गीतों , शादी के कार्डो पर विदाई के समय की डोली – कहार की छपी फोटो व् फ़िल्मी गीतों तथा फिल्म और सीरियलों के माध्यम से ही नयी पीढ़ी को सुनने व् देखने को मिल रहा है। बीते दिनों की शान व् वैवाहिक कार्यक्रम की पहचान रखने वाली डोली अब कहानी सी बन कर रह गयी है।

संकेतिक गूगल फोटो

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