सोनाडीह स्थित मॉ भगवती के मन्दिर मे निष्काम भाव से दर्शन व पूजन करने से सारे पाप धुल जाते है

बिल्थरारोड। स्थानीय नगर के उत्तर दिशा मे 8 किलोमीटर दूर सोनाडीह स्थित देवी भागेश्वरी परमेश्वरी मन्दिर पूर्वान्चल के ख्याति सिद्ध शक्ति पीठो मे से एक है। वासांतिक नवरात्र में श्रद्धालुओ की पूजन अर्चन करने हेतु भारी भीड़ लगी रही । रामनवमी से लगभग एक पखवाड़े तक मंदिर परिसर में मेला लगता हैं।जहाँ पर मौत का कुँआ, लोकनृत्य, चरखी आदि सहित लजीज व्यंजनो की दुकानें सज गयी है।आस्था और विश्वास का केन्द्र बने मॉ भगवती के मन्दिर मे निष्काम भाव से दर्शन व पूजन करने से सारे पाप धुल जाते है। इस शक्तिपीठ के सम्बन्ध मे अनेक लोकोक्तियां और जनश्रुतिया प्रचलित है। कहा जाता है कि सोनाडीह के आस-पास के क्षेत्रो मे महाहनु नाम का एक राक्षस रहता था। जिसके आतंक से लोग भयभीत रहते थें। राक्षस द्वारा धार्मिक अनुष्ठानो मे विघ्न डालने व अत्याचार करने से चारों तरफ त्राहि त्राहि मची हुई थी। भक्तो की दुर्दशा की अन्तर्नाद को सुनकर मॉ भगवती अत्याचारी राक्षस महाहनु का संहार करने के लिए खोज मे निकल पड़ी। भगवती को अपने तरफ आते देख राक्षस महाहनु रुक गया और भगवती के मनोहारी अनुपम सौदर्य को देखकर मुग्ध हो गया और उनसे विवाह करने का प्रस्ताव रखा। राक्षस महाहनु की बात को सुनकर भगवती ने कहा कि मेरे नहाने के लिए यदि तुम एक रात में सरयु नदी से नाला खोदकर सोनाडीह तक ला दो तो तुम से विवाह कर सकती हूं। भगवती की बात को सुनकर राक्षस राजी हो गया और शाम होते ही नाला खोदना शुरू कर दिया। अभी वह सोनाडीह से कुछ दूरी पहले तक ही नाला खोद पाया था कि सूर्योदय हो गया। अपने बात पर नाकाब होने के बाद भी देवी भगवती से विवाह करने के जिद पर ही अड़ा रह गया। इसके परिणाम स्वरूप देवी व राक्षस महाहनु में संग्राम शुरू हो गया। अन्ततः देवी भगवती ने राक्षस महाहनु का वध कर दिया। राक्षस द्वारा खोदे गए नाले को हाहानाला तथा युद्ध के दौरान गिरे रक्त से ताल का निर्माण हो गया। जो कालान्तर में ताल रतोई के नाम से जाना जाता है। मंदिर परिसर में सैकड़ों की संख्या में लाल बंदर घूमते रहते है। जिनके बारे में कहा जाता है कि इन्हीं बंदरों के पूर्वज देवी भगवती की सेना में शामिल थे। शारदीय और वासंतिक नवरात्र में श्रद्धालुओं की देवी दर्शन और पूजन के लिए भारी भीड़ लगती है। नवरात्र में मां भगवती के दर्शन करने के लिए पूर्वांचल के अन्य जिलों के लोग आते है। यहाँ पर उपनयन संस्कार और विवाह भी होता रहता है। मंदिर पर गंगा-जमुनी तरजीह देखने को मिलती हैं।
